Tue, 11 Feb 2025 22:40:59 - By : SANDEEP KR SRIVASTAVA
वाराणसी: चॉकलेट के बहाने एक मासूम बच्ची के साथ दुष्कर्म के मामले में विशेष पॉक्सो अदालत ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। विशेष न्यायाधीश अनुभव द्विवेदी ने 6 साल लंबे कानूनी संघर्ष के बाद आरोपी अखिलेश गुप्ता को 20 वर्ष के कठोर कारावास** की सजा सुनाई। साथ ही, अदालत ने दोषी पर 20,000 रुपये का जुर्माना लगाया और चेतावनी दी कि जुर्माना न भरने पर 2 माह का अतिरिक्त कारावास झेलना होगा।
गौरतलब है,कि 3 अगस्त 2018 को चौबेपुर थाना क्षेत्र के एक ग्रामीण परिवार की 4 वर्षीय बच्ची को उसके पड़ोसी अखिलेश गुप्ता ने चॉकलेट देकर अपने घर के टीनशेड कमरे में ले गया। वहाँ उसने नाबालिग के साथ दुष्कर्म किया, जिससे बच्ची बेहोश हो गई। माता-पिता ने बच्ची की चीख सुनकर घटनास्थल पर पहुँचने पर उसे लहूलुहान अवस्था में पाया। आरोपी उस वक्त खुद भी खून से सना हुआ था, लेकिन मौके का फायदा उठाकर भाग निकला।
पीड़िता के पिता ने तुरंत चौबेपुर थाना में एफआईआर दर्ज कराई। पुलिस ने बच्ची को अस्पताल में भर्ती करवाकर मेडिकल जाँच कराई, जिसमें दुष्कर्म की पुष्टि हुई। आरोपी को गिरफ्तार कर पॉक्सो एक्ट और भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की प्रासंगिक धाराओं के तहत मुकदमा चलाया गया। विशेष लोक अभियोजक संतोष कुमार सिंह ने अदालत में सबूतों के आधार पर आरोपों को पुख्ता किया।
न्यायाधीश अनुभव द्विवेदी ने फैसले में कहा कि यह अपराध मानवता के खिलाफ जघन्य कृत्य है। नाबालिगों की सुरक्षा सुनिश्चित करना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए।उन्होंने 2018 की घटना को पॉक्सो एक्ट की धारा 6 (सजा-ए-मौत या उम्रकैद) के तहत रखते हुए आरोपी को अधिकतम सजा सुनाई। अदालत ने मामले की संवेदनशीलता और पीड़िता के शारीरिक-मानसिक आघात को ध्यान में रखते हुए निर्णय लिया।
पीड़िता के पिता ने कहा, 6 साल का इंतजार कठिन था, लेकिन न्याय मिलने से थोड़ी राहत मिली। समाज में ऐसे अपराधियों के खिलाफ सख्ती जरूरी है।
वहीं वाराणसी पुलिस प्रवक्ता ने बताया, यह फैसला पीड़ित परिवार और न्याय प्रणाली के लिए एक मिसाल है। पॉक्सो मामलों में त्वरित सुनवाई पर हमारा फोकस है।
यह मामला नाबालिगों के प्रति सामाजिक सजगता और कानून के कड़े प्रावधानों के क्रियान्वयन की अहमियत को रेखांकित करता है। विधि विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे फैसले न केवल पीड़ितों को न्याय दिलाते हैं, बल्कि अपराधियों के लिए चेतावनी का संकेत भी होते हैं।
इस घटना से स्पष्ट है कि बाल सुरक्षा को लेकर समाज और प्रशासन को मिलकर कड़े कदम उठाने होंगे। न्याय में देरी भले ही हुई हो, लेकिन यह फैसला भविष्य में ऐसे अपराधों पर अंकुश लगाने की दिशा में एक सार्थक कदम है।