Thu, 27 Mar 2025 22:28:49 - By : SANDEEP KR SRIVASTAVA
कानपुर: एक छोटी सी उम्र... जब उसके हाथों में किताबें और खिलौने होने चाहिए, तब उसकी आँखों में डर के साये हैं। जब उसे स्कूल वैन में खिलखिलाकर दोस्तों के साथ बैठना चाहिए, तब वह अकेलेपन और यातना के गहरे गड्ढे में धकेल दी गई। LKG में पढ़ने वाली यह मासूम बच्ची आज अपने घर में सिसक रही है, क्योंकि जिस वैन ड्राइवर को उसने अंकल कहकर पुकारा, उसी ने उसकी निर्ममता से भोली-भाली दुनिया को तोड़कर रख दिया।
वह दिन... जब मासूमियत रो पड़ी
मम्मी, अंकल ने गलत तरीके से छुआ... - यह वाक्य सुनते ही माँ का दिल धड़कनों में डूब गया। बच्ची ने बताया कि ड्राइवर आरिफ ने उसे रोज की तरह स्कूल न ले जाकर एक सुनसान जगह पर ले गया। वहाँ उसने नन्ही सी जान को डराया, उसके कपड़े उतारे और उसकी मासूमियत को नोंच डाला। जिस वैन में उसे हर रोज हँसते-गाते जाना चाहिए था, आज वही वैन उसके लिए एक डरावना सपना बन गई।
यह सवाल सिर्फ एक बच्ची के दर्द तक सीमित नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक विवेकशून्यता पर करारा तमाचा है। क्या हम इतने निर्दयी हो गए हैं कि मासूमों की चीखें भी हमारे कानों तक नहीं पहुँचती? क्या हमारी व्यवस्था इतनी कमजोर है कि कोई भी दरिंदा बच्चों की दुनिया में घुसकर उनकी आत्मा को लहूलुहान कर दे।
हालाँकि पुलिस ने POCSO एक्ट के तहत मामला दर्ज कर लिया है और आरोपी की तलाश जारी है, लेकिन क्या यह काफी है? क्या हर बार एक मासूम के साथ होने वाली हैवानियत के बाद सिर्फ FIR दर्ज करके हम अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाते हैं? स्कूल प्रशासन की लापरवाही, अभिभावकों की मजबूरी और समाज की संवेदनहीनता—यह त्रासदी किसी एक की नहीं, बल्कि हम सभी की सामूहिक विफलता है।
इस घटना ने न सिर्फ एक परिवार को तोड़ा है, बल्कि हर उस अभिभावक के मन में डर बैठा दिया है जो अपने बच्चों को स्कूल भेजते समय यह सोचता है कि कहीं वापसी में उनकी मासूमियत भी तो नहीं छिन जाएगी। समाजसेवी संगठनों ने सख्त कानून और स्कूल वैनों में सीसीटीवी अनिवार्य करने की माँग उठाई है, लेकिन क्या कानून बनाने से पहले हमें अपनी नैतिक जिम्मेदारी नहीं समझनी चाहिए।
आज उस बच्ची की आवाज बनने की जरूरत है, जिसकी चीखें दीवारों के भीतर दबकर रह गईं। आज हमें यह सवाल खुद से पूछना होगा—क्या हम एक ऐसे समाज का निर्माण कर रहे हैं जहाँ बच्चे सुरक्षित नहीं हैं? अगर हम अब भी नहीं जागे, तो कल यह कहानी किसी और के बच्चे की होगी... और फिर हम सब सिर्फ अखबारों की सुर्खियाँ बनकर रह जाएँगे।
यह खबर न सिर्फ एक घटना का ब्योरा है, बल्कि हम सभी के अंतर्मन को झकझोरने का एक प्रयास भी। अगर आप भी बच्चों की सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं, तो आवाज उठाइए... क्योंकि मौन रहकर हम अपराधियों का साथ देते हैं।
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